पाकिस्तान में सिंधुदेश की मांग अचानक सुर्खियों में आ गई है, कराची और सिंध के अलग‑अलग इलाकों में हाल के दिनों में हिंसक विरोध‑प्रदर्शनों ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। यह आंदोलन न सिर्फ पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता के लिए चुनौती बन रहा है, बल्कि भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया की भू‑राजनीति पर इसके दूरगामी असर हो सकते हैं।
सिंधुदेश क्या है?
सिंधुदेश एक अलग राष्ट्र की वह कल्पना है जिसमें पाकिस्तान के सिंध प्रांत को स्वतंत्र सिंधी देश के रूप में स्थापित करने की मांग की जाती है। यह विचार मुख्य रूप से सिंधी राष्ट्रवादी समूहों और प्रवासी सिंधी नेताओं के बीच लोकप्रिय है, जो खुद को पाकिस्तान के भीतर उपेक्षित और शोषित मानते हैं।
आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सिंधुदेश विचार की वैचारिक नींव सिंधी नेता जी.एम. सैयद ने 1970 के दशक में रखी, जिन्होंने बांग्लादेश की आज़ादी के बाद सिंध के लिए भी अलग राष्ट्र की परिकल्पना पेश की। भाषा, संस्कृति और संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर केंद्र से असंतोष ने सिंधी राष्ट्रवाद को हवा दी और ‘जेय सिंध’ जैसी पार्टियां इसी असंतोष की राजनीतिक अभिव्यक्ति बनीं।
पाकिस्तान में सिंध की अहमियत
सिंध प्रांत पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है क्योंकि कराची देश की सबसे बड़ी–शहर और वित्तीय राजधानी है, साथ ही सिंध कृषि, उद्योग और बंदरगाह के लिहाज से बेहद रणनीतिक है। इंडस नदी के निचले बहाव, गैस‑कोयला संसाधन, और कराची पोर्ट पर नियंत्रण के कारण सिंध का किसी भी तरह से अलग होना पाकिस्तान के लिए अस्तित्वगत संकट जैसा होगा।
ताज़ा खबर: कराची और सिंध में बवाल
हाल ही में सिंध कल्चर डे के मौके पर कराची में निकली रैलियां सिंधुदेश के समर्थन में हिंसक हो गईं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों ने अलग राष्ट्र के नारे लगाए। रिपोर्टों के मुताबिक पत्थरबाज़ी, तोड़फोड़, पुलिस वाहनों को नुकसान और कई सुरक्षाकर्मियों के घायल होने के बाद दर्जनों प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया है।
मनीकंट्रोल, फर्स्टपोस्ट और पाकिस्तानी मीडिया स्रोतों के अनुसार इन प्रदर्शनों में सोशल मीडिया पर चल रहे सिंधुदेश कैंपेन और स्थानीय राजनीतिक नाराजगी ने बड़ी भूमिका निभाई। कई वीडियो और रिपोर्टों में ‘फ्री सिंध’, ‘सिंधुदेश इज़ नॉट पाकिस्तान’ जैसे नारे और बैनर दिखाई दे रहे हैं।
अशांति की जड़ें: पानी, जमीन और प्रतिनिधित्व
विश्लेषकों का मानना है कि सिंध में उबाल का बड़ा कारण संसाधनों पर नियंत्रण की लड़ाई है, खासकर इंडस नदी के पानी के बंटवारे को लेकर गहरी नाराजगी है। सिंधी संगठनों का आरोप है कि पंजाब की ओर झुकी नीतियों से सिंध में सूखे और सिंचाई संकट की स्थिति बन रही है, जबकि फैसले इस्लामाबाद और लाहौर में बैठकर किए जाते हैं।
इसके साथ ही ‘कॉरपोरेट फार्मिंग’ के नाम पर हजारों एकड़ जमीन सेना‑समर्थित कंपनियों और बाहरी निवेशकों को देने के फैसलों ने स्थानीय किसानों और जगीरदार समुदायों को भड़का दिया है। मानवाधिकार उल्लंघन, जबरन गायब किए जाने के आरोप और राजनीतिक हाशिये पर धकेले जाने की भावना ने मिलकर अलगाववादी नारों को और तेज कर दिया है।
सिंधी राष्ट्रवादी समूह और उनकी ताकत
सिंधुदेश की मांग मुख्य रूप से विभिन्न ‘जेय सिंध’ धड़ों, सिंधुदेश लिबरेशन आर्मी जैसे उग्रपंथी गुटों और प्रवासी सिंधी संगठनों के इर्द‑गिर्द घूमती है। कुछ समूह लोकतांत्रिक तरीके से अधिक स्वायत्तता और संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण की मांग करते हैं, जबकि कुछ अतिवादी गुटों पर हिंसक गतिविधियों के आरोप लगते रहे हैं।
हालांकि चुनावी राजनीति में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) सिंध पर हावी है और सिंधुदेश समर्थक दलों का वोट शेयर बेहद सीमित माना जाता है, जो दिखाता है कि फिलहाल यह आंदोलन जनसमर्थन की बजाय प्रतीकात्मक और वैचारिक स्तर पर अधिक मजबूत है।
भारत में सिंधुदेश चर्चा क्यों तेज?
भारतीय टीवी चैनलों, यूट्यूब और अखबारों में सिंधुदेश को लेकर बहसें इसलिए बढ़ी हैं क्योंकि इसे कई विश्लेषक पाकिस्तान के संभावित ‘दूसरे बांग्लादेश’ की तरह देखते हैं। भारतीय मीडिया में यह नैरेटिव भी उभर रहा है कि आर्थिक दिवालियापन, सेना‑राजनीति टकराव, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में अलगाववाद के साथ‑साथ अब सिंध में उभार पाकिस्तान को अंदर से तोड़ सकता है।
इंडिया टुडे जैसे प्लेटफॉर्म यह संकेत देते हैं कि सिंध का भारत से ऐतिहासिक‑सांस्कृतिक रिश्ता गहरा रहा है, लेकिन मौजूदा सिंधी राजनीतिक गुट भारत में विलय नहीं बल्कि या तो अधिक स्वायत्तता या स्वतंत्र सिंधुदेश की बात करते हैं। इसीलिए दिल्ली की आधिकारिक लाइन बार‑बार यह दोहराती दिखती है कि भारत पाकिस्तान को तोड़ने के किसी एजेंडे पर नहीं है और यह पाकिस्तान के आंतरिक विरोधाभास हैं जो उसे अस्थिर कर रहे हैं।
भारत की चिंताएं और रणनीतिक गणित
भारत की पहली चिंता यह है कि पाकिस्तान के भीतर अस्थिरता और हिंसा का सीधा असर सीमा‑सुरक्षा और आतंकवाद के खतरे पर पड़ सकता है। किसी भी बड़े पैमाने पर नागरिक संघर्ष या दमन से शरणार्थियों की संभावित लहर, हथियारों की तस्करी और सीमा पार आतंकी संगठनों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं।
दूसरी तरफ, कुछ भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सिंध या अन्य प्रांत अधिक स्वायत्त या स्वतंत्र हो जाते हैं तो पाकिस्तान की “स्ट्रैटेजिक डेप्थ” और सैन्य क्षमता कमजोर होगी, जिससे भारत के लिए परंपरागत युद्ध का खतरा घट सकता है। लेकिन साथ ही यह डर भी है कि बिखरे हुए, अस्थिर और परमाणु हथियारों वाले क्षेत्र में नई‑नई इकाइयां उभरने से अनिश्चितता और जोखिम बढ़ सकते हैं।
पाकिस्तान के संभावित विभाजन की चर्चा
थिंक‑टैंक लेखों और टीवी डिबेट में यह संभावना बार‑बार उठती है कि अगर बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और गिलगित‑बाल्टिस्तान में असंतोष और अलगाववाद एक साथ भड़क उठे तो पाकिस्तान कई हिस्सों में बंट सकता है। कुछ विश्लेषक तो पांच नए भू‑राजनीतिक इकाइयों—जैसे बलूचिस्तान, सिंधुदेश, पश्तूनिस्तान आदि—की थ्योरी पेश कर रहे हैं, हालांकि यह अभी अनुमान और परिकल्पना की ही श्रेणी में है।
संभावित परिदृश्य तालिका
| परिदृश्य | मुख्य विशेषता | क्षेत्रीय असर |
| नियंत्रित सुधार | पाकिस्तान सीमित स्वायत्तता और संसाधन साझा मॉडल अपनाए | तनाव घट सकता, लेकिन सेना‑केंद्र टकराव जारी रह सकता है |
| धीमा विघटन | लंबी अवधि में प्रांतों को ढीली संघीय संरचना या ‘कॉनफेडरेशन’ जैसा स्टेटस | भारत सहित पड़ोसी देशों को नई सीमाओं और समझौतों के लिए तैयार रहना होगा |
| अचानक बिखराव | किसी बड़े राजनीतिक‑सैन्य संकट या गृहयुद्ध के बाद तेजी से विभाजन | शरणार्थी संकट, परमाणु सुरक्षा और चरमपंथ सबसे बड़े खतरे होंगे |
अभी की वास्तविकता क्या कहती है?
नीतिगत अध्ययनों के अनुसार, सिंधुदेश आंदोलन अभी पाकिस्तान की अखंडता के लिए तात्कालिक सैन्य खतरा नहीं बल्कि राजनीतिक‑सामाजिक दबाव का स्रोत माना जाता है क्योंकि मुख्यधारा सिंधी राजनीति अब भी पाकिस्तान के भीतर रहकर अधिकारों की लड़ाई पर जोर देती है। फिर भी, लगातार प्रदर्शन, मानवाधिकार के सवाल और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिंधी प्रवासियों की आवाज़ पाकिस्तान की छवि और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय में, अगर इस असंतोष को राजनीतिक संवाद, न्यायपूर्ण संसाधन बंटवारे और प्रांतीय स्वायत्तता से एड्रेस नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में सिंधुदेश की मांग और पाकिस्तान के संभावित विभाजन की चर्चा और तेज हो सकती है। लेकिन फिलहाल, यह विषय सड़क के नारों, मीडिया की बहसों और अकादमिक विश्लेषणों तक सीमित है, कोई औपचारिक ‘बंटवारे की प्रक्रिया’ शुरू नहीं हुई है।
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