नीतीश कुमार ने 18वीं बिहार विधानसभा में नए स्पीकर प्रेम कुमार को इसलिए कुछ सेकंड के लिए कुर्सी पर बैठने से रोका, ताकि तेजस्वी यादव पहुंच जाएं और दोनों मिलकर उन्हें परंपरा के मुताबिक आसन तक छोड़ आएं। इसी दौरान, इस छोटे से इशारे ने पटना की सियासत में टकराव से ज्यादा “तालमेल की फोटो” बना दी, जिसके सियासी मायने अब दूर तक निकाले जा रहे हैं।
अब सवाल उठता है, घटना क्या थी?
दरअसल, 18वीं बिहार विधानसभा के विशेष सत्र में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और 9 बार के विधायक प्रेम कुमार को सर्वसम्मति से स्पीकर चुना गया।
परंपरा के अनुसार, मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष नव-निर्वाचित स्पीकर को हाथ पकड़कर आसन तक छोड़ने जाते हैं, ताकि संदेश जाए कि सदन की मर्यादा सत्ता–विपक्ष से ऊपर है।
इसी कड़ी में, पटना स्थित विधानसभा के इसी सत्र में नीतीश कुमार ने प्रेम कुमार का हाथ पकड़ लिया, लेकिन उन्हें तुरंत बैठाने के बजाय पहले “रुकिए, तेजस्वी आ रहे हैं” जैसी बॉडी लैंग्वेज दिखाई, जिसे कैमरों ने कैद कर लिया।
इसी बीच, पटना की राजनीति में ‘सियासी स्नेह’ की चर्चा तेज हो गई।
पटना की गलियों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बात यही रही कि नीतीश और तेजस्वी भले ही आज सत्ता–विपक्ष में आमने–सामने हों, लेकिन सदन के अंदर दोनों ने एक “सभ्य” और “सॉफ्ट” सियासत का मैसेज दिया।
इसके साथ ही, दोनों ने मिलकर स्पीकर प्रेम कुमार को कुर्सी तक छोड़ा, हाथ थामकर उन्हें बैठाया और मुस्कुराते हुए बधाई दी, जिससे यह तस्वीर तुरंत पटना की सोशल मीडिया टाइमलाइन पर वायरल हो गई।
यही नहीं, कई पुराने नेता यह भी याद दिलाने लगे कि पहले भी एक कार्यकाल में नीतीश CM और तेजस्वी नेता प्रतिपक्ष रहते हुए स्पीकर को इसी तरह साथ ले जाकर आसन पर बैठा चुके हैं, यानी दृश्य भले नया न हो, लेकिन सियासी संदर्भ बिल्कुल नया है।
अब सवाल यह है कि संकेत क्या दे गई ये तस्वीर?
2025 के चुनाव में पटना से शुरू हुई कड़वी बयानबाज़ी, आरोप–प्रत्यारोप और रैलियों के तीखे हमलों के बाद भी सदन के भीतर इस तरह की “कोमल फोटो” ने यह संदेश दे दिया कि बिहार की राजनीति सिर्फ चुनावी जंग नहीं, बल्कि संसदीय परंपराओं का मंच भी है।
साथ ही, एनडीए की प्रचंड जीत और महागठबंधन के बुरे प्रदर्शन के बीच भी नीतीश का यह कदम विपक्ष को सम्मान देने की एक स्टाइलिश कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, ताकि सदन की कार्यवाही पटना की सड़क वाली कड़वाहट से अलग दिखे।
उधर, तेजस्वी यादव ने भी स्पीकर को बधाई देते हुए “गरीबी–पलायन मुक्त नया बिहार” जैसे शब्दों पर जोर दिया, जिससे पटना की राजनीति में खुद को जिम्मेदार विपक्ष के रूप में प्रोजेक्ट करने की उनकी रणनीति साफ दिखी।
इसी संदर्भ में, पटना ब्रांडिंग: विधानसभा से व्हॉट्सऐप तक का एंगल भी उभरकर सामने आया।
पटना की राजनीतिक ब्रांडिंग इस एक दृश्य पर टिकी दिखी – टीवी चैनलों ने इसे “सियासी स्नेह”, “सदन की शालीनता” और “नया पॉलिटिकल कल्चर” जैसे टाइटल देकर बार–बार चलाया, जिससे पटना का नाम नेशनल प्राइम टाइम में लगातार ट्रेंड करता रहा।
इसके अलावा, सोशल मीडिया पर मीमबाज़ों ने इसे “सीएम–एलओपी जॉइंट वेंचर” से लेकर “पॉलिटिकल री-यूनियन की झलक” तक कई तड़केदार कैप्शन दे दिए, पर सबकी सहमति यही रही कि यह तस्वीर पटना को “संविधान–केंद्रित राजनीति” वाला शहर दिखाती है, सिर्फ जातीय खेमेबंदी का नहीं।
इसी के साथ, पटना की युवा राजनीति के लिए यह फ्रेम उपयोगी कंटेंट बन गया – एक ही फोटो से “संस्थागत मर्यादा”, “सहयोग के संकेत” और “डेमोक्रेटिक कल्चर” जैसे शब्द ट्रेंड हो रहे हैं, जो आगे चलकर पटना की इमेज बिल्डिंग में काम आएंगे।
आख़िर में, आगे की सियासत पर क्या असर पड़ सकता है, यह भी अहम है।
शीतकालीन सत्र में सरकार बनाम विपक्ष की तल्ख बहसें तो होंगी ही, लेकिन स्पीकर के आसन तक साथ–साथ जाते नीतीश–तेजस्वी की यह तस्वीर हर बार क्लिप के रूप में प्ले होकर दोनों खेमों को मर्यादा याद दिलाती रहेगी। इसके साथ-साथ, पटना की पॉलिटिकल हवा यह भी कह रही है कि नीतीश कुमार अपने पुराने “मैनेजर सीएम” अवतार में लौटना चाहते हैं, जहां वे विरोधियों से टकराव की बजाय संवाद और प्रतीकात्मक इशारों से संदेश देते हैं।
वहीं, तेजस्वी के लिए भी यह फ्रेम फायदेमंद है, क्योंकि हार के बाद उन्हें “जिम्मेदार, संयमित नेता प्रतिपक्ष” की नई इमेज गढ़नी है, और पटना विधानसभा की यह छोटी घटना उनके लिए आगे चलकर बड़ा विजुअल एसेट बन सकती है। इसी तरह, 18वीं विधानसभा की यह कुछ सेकंड की “रुकिए, साथ बैठाएंगे” वाली कहानी सिर्फ एक संसदीय रस्म नहीं, बल्कि पटना की भविष्य की सियासत की संभावित पटकथा का एक रोमांचक ट्रेलर लग रही है
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