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डिजिटल अरेस्ट क्या है? भारत में बढ़ती साइबर ठगी, हाल की घटनाएं, सरकार और न्यायपालिका के दिशा-निर्देश

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वर्तमान समय में साइबर अपराधों की नई-नई विधाओं का उदय हो रहा है, इनमें ‘डिजिटल अरेस्ट’ सबसे अधिक चर्चा में है। यह एक ऐसी धोखाधड़ी की तकनीक है, जिसमें नागरिकों को भयभीत कर धन वसूलने के लिए अपराधियों द्वारा इंटरनेट और मोबाइल जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग किया जाता है। इस लेख में हाल में घटित घटनाएँ, भारत सरकार की प्रतिक्रिया, और न्यायपालिका द्वारा जारी दिशानिर्देशों का विश्लेषण किया गया है।​

डिजिटल अरेस्ट: क्या है और कैसे होता है?

डिजिटल अरेस्ट एक साइबर क्राइम स्कैम है जिसमें जालसाज खुद को पुलिस अधिकारी, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय या अन्य सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को धमकाते हैं कि उन पर मनी लॉन्ड्रिंग, ऑनलाइन ठगी, या किसी गंभीर अपराध का मामला दर्ज है। अपराधी फोन या वीडियो कॉल करते हैं, फर्जी दस्तावेज और सुपारी जैसे कागजात भेजते हैं। वे धमकी देते हैं कि बैंक अकाउंट, पासपोर्ट, सिम कार्ड ब्लॉक कर दिया जाएगा और गिरफ्तारी होगी अगर तुरंत पैसे नहीं दिए गए। पीड़ित को कहा जाता है कि परिवार या वकील से संपर्क न करें, और ‘जमानत’, ‘सिक्योरिटी डिपॉजिट’ के नाम पर बड़ी रकम वसूली जाती है।​

हाल की घटनाएँ

भारत में डिजिटल अरेस्ट स्कैम के मामलों में तेजी आई है। मार्च 2025 में कर्नाटक के एक वृद्ध दंपत्ति ने ₹50 लाख की ठगी के बाद आत्महत्या कर ली। वरिष्ठ दंपत्ति, एंबाला (हरियाणा) ने पिछले महीने ₹1 करोड़ खो दिया, जब उनसे सीबीआई के नाम पर धमकी देकर पैसे मंगाए गए। NCRP के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में 39,925 केस थे, जो 2024 में बढ़कर 1,23,672 हो गए। 2025 के पहले दो महीनों में 17,718 मामले सामने आए, जिसमें ₹210.21 करोड़ की ठगी हुई। अधिकांश स्कैम्स म्यांमार, लाओस एवं कंबोडिया से संचालित होते हैं, किन्तु कई बार भारतीय नागरिक भी संलिप्त पाए गए।​

भारत सरकार की पहल

भारतीय सरकार ने साइबर अपराध नियंत्रण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।​

  • केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत I4C (Indian Cyber Crime Coordination Centre) की स्थापना हुई है।​
  • पुलिस अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों को साइबर अपराध की जाँच में प्रशिक्षित किया जा रहा है; अब तक 98,000 से ज्यादा पुलिसकर्मी प्रशिक्षित हुए हैं।​
  • साइबर दोस्त, SancharSathi पोर्टल, SMS व सोशल मीडिया के माध्यम से जन जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।​
  • साइबर हेल्पलाइन ‘1930’ की सुविधा दी गई है। राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज करना भी आसान किया गया है​ |
  • केंद्र सरकार द्वारा 3,962 स्काइप IDs, 83,668 WhatsApp अकाउंट और 7.81 लाख सिम कार्ड व 2,08,469 IMEIs को ब्लॉक करने की कार्यवाही की गई।​

भारतीय न्याय प्रणाली की भूमिका एवं दिशानिर्देश

भारत के उच्चतम न्यायालय और कई उच्च न्यायालयों ने डिजिटल अरेस्ट स्कैम्स पर सख्‍त रुख अपनाया है।​

  • सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2025 में इस पर स्वतः संज्ञान लिया और इसे “गंभीर चिंता का विषय” बताया।​
  • अदालतों ने स्पष्ट किया कि डिजिटल अरेस्ट का कोई कानूनी आधार भारत में नहीं है और इसे जटिल और भ्रामक साइबर फ्रॉड करार दिया।​
  • राजस्थान तथा दिल्ली उच्च न्यायालय ने साइबर अपराधों के मामलों के त्वरित निपटारे, पुलिस ट्रेनिंग और साइबर क्राइम हेल्पलाइन के तत्काल रेस्पॉन्स पर जोर दिया।​
  • पीड़ितों से कहा गया कि तुरंत साइबर पोर्टल या हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करें और कोई भी राशि देने से बचें।​

निष्कर्ष

डिजिटल अरेस्ट भारतीय नागरिकों के लिए एक नई साइबर चुनौती है, जिसमें ठग अत्याधुनिक तकनीक के ज़रिए डर और भ्रम फैला रहे हैं। सरकार और न्यायपालिका दोनों इस समस्या से निपटने के लिए सक्रिय हैं—जागरूकता, त्वरित कार्रवाई, और विधिक सहायता से इसमें कमी लाई जा सकती है। आम नागरिकों को सचेत रहना चाहिए, किसी भी धमकी या धोखे में फंसकर पैसे न भेजें और तत्काल पुलिस या साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर शिकायत करें।


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