Washington D.C. में व्हाइट हाउस के नज़दीक दो नेशनल गार्ड जवानों पर हुए हमले ने अमेरिका को हिला कर रख दिया है। बेहद सुरक्षित माने जाने वाले ज़ोन में दिनदहाड़े हुई इस फायरिंग को अधिकारी “टारगेटेड शूटिंग” यानी सोची–समझी घात लगाकर किया गया हमला बता रहे हैं। व्हाइट हाउस के पास नेशनल गार्ड पर फायरिंग पर पढिए ये रिपोर्ट –
घटना कहाँ और कैसे हुई?
बुधवार, 26 नवंबर को दो नेशनल गार्ड के जवान वॉशिंगटन D.C. के एक व्यस्त इलाके में गश्त पर थे, जो व्हाइट हाउस से कुछ ही ब्लॉक की दूरी पर स्थित है। बताया गया कि वे “हाई विज़िबिलिटी पेट्रोल” पर थे, यानी आम लोगों को सुरक्षा का अहसास कराने के लिए वर्दी में खुले तौर पर तैनात थे, तभी अचानक एक हमलावर ने पास आकर उन पर गोलियां बरसा दीं।
प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिस के अनुसार, हमलावर एक मोड़ से निकलकर आया, हथियार निकाला और बेहद नज़दीक से फायरिंग शुरू कर दी, जिससे दोनों जवान गंभीर रूप से घायल हो गए। एक जवान ने जवाबी फायरिंग भी की, जिसके बाद हमलावर भी घायल हो गया और बाद में मौके पर मौजूद जवानों व पुलिस ने उसे काबू में कर लिया।
घायल जवानों की हालत क्या है?
दोनों जवान वेस्ट वर्जीनिया नेशनल गार्ड के बताए जा रहे हैं और उन्हें सिर व ऊपरी हिस्से में गंभीर चोटें आई हैं। शुरुआती रिपोर्टों में यहाँ तक कहा गया कि वे शहीद हो गए, लेकिन बाद में जानकारी सुधारी गई और बताया गया कि वे फिलहाल अस्पताल में आईसीयू में “क्रिटिकल कंडीशन” में हैं।
डॉक्टरों और अधिकारियों के बयान से साफ है कि अगले कुछ घंटे उनके लिए बेहद नाज़ुक हैं और उनकी जिंदगी बचाने के लिए डॉक्टरों की टीमें लगातार ऑपरेशन व इलाज में जुटी हैं। वेस्ट वर्जीनिया के गवर्नर ने भी बयान देकर कहा कि उनकी टीम को सैनिकों की स्थिति पर परस्पर विरोधी अपडेट मिल रहे हैं, इसलिए फिलहाल परिवारों को पूरी सहानुभूति और प्राइवेसी दी जा रही है।
संदिग्ध कौन है और क्या पता चला?
कई अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों में संदिग्ध की पहचान एक अफ़गान मूल के व्यक्ति के तौर पर की जा रही है, जो पहले अमेरिकी एजेंसियों के साथ काम कर चुका है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक वह पहले CIA–समर्थित अभियानों से जुड़ा रहा था और बाद में शरण या वीज़ा प्रोग्राम के ज़रिए अमेरिका पहुँचा।
फिलहाल संदिग्ध भी अस्पताल में है और एफबीआई की जॉइंट टेररिज्म टास्क फोर्स उसकी पृष्ठभूमि, रिश्तों और मानसिक स्थिति से जुड़े हर एंगल की जांच कर रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला किसी बड़ी साजिश का हिस्सा था या फिर अकेले व्यक्ति की कट्टर सोच, व्यक्तिगत गुस्से या मानसिक अस्थिरता का नतीजा।
यह हमला कितना ‘टारगेटेड’ था?
वॉशिंगटन पुलिस और संघीय एजेंसियों के अफसरों ने साफ कहा है कि यह कोई रैंडम शूटिंग नहीं, बल्कि “एम्बुश–स्टाइल टारगेटेड अटैक” था। हमलावर सीधे उन जवानों के पास गया जो नेशनल गार्ड की वर्दी में गश्त कर रहे थे, और बिना किसी झड़प या बहस के अचानक गोलियां चलानी शुरू कर दीं।
अधिकारियों ने संकेत दिया है कि जिस तरह से हमलावर ने लोकेशन चुना (व्हाइट हाउस से लगभग दो ब्लॉक दूर) और सुरक्षा बलों को ही निशाना बनाया, उससे यह घटना सामान्य अपराध की बजाय संघीय सुरक्षा तंत्र पर सीधा हमला लगती है। यही वजह है कि इस केस को संघीय कानून के तहत “फेडरल लॉ एन्फोर्समेंट ऑफिसर पर अटैक” माना जा रहा है और एफबीआई ने आधिकारिक तौर पर जांच की कमान संभाल ली है।
व्हाइट हाउस और संघीय सरकार की प्रतिक्रिया
हमले के तुरंत बाद इलाके को सील कर दिया गया, सड़कों पर पुलिस, सीक्रेट सर्विस, और अन्य एजेंसियों के वाहन दिखाई देने लगे और हवा में हेलिकॉप्टर गश्त बढ़ा दी गई। व्हाइट हाउस के पास हुए इस हमले के बाद आसपास के कई दफ्तरों, मेट्रो स्टेशनों और सरकारी इमारतों में कुछ समय के लिए अलर्ट लेवल बढ़ा दिया गया।
रिपोर्ट्स के अनुसार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे “शैतानी हमला” और नेशनल गार्ड पर “घृणित वार” जैसी कड़ी शब्दावली के साथ निंदा की और सुरक्षा एजेंसियों को सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। प्रशासन ने तुरंत लगभग 500 अतिरिक्त नेशनल गार्ड जवान वॉशिंगटन D.C. भेजने का आदेश दिया, जिससे राजधानी में तैनात सैनिकों की संख्या 2,000 से ऊपर पहुँच गई है।
आम अमेरिकियों पर मनोवैज्ञानिक असर
घटना का समय और जगह दोनों बहुत प्रतीकात्मक हैं: थैंक्सगिविंग से ठीक एक दिन पहले, देश की सत्ता के दिल कहे जाने वाले इलाके में, वर्दी पहने सैनिकों पर हमला। आम अमेरिकी पहले ही अपराध, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, ऐसे में व्हाइट हाउस के आसपास गोलियों की आवाज़ें सुनना उनके लिए किसी बुरे सपने जैसा है।
सोशल मीडिया पर एक तरफ लोगों ने घायल सैनिकों के लिए दुआएं मांगीं और उन्हें “हीरो” बताया, वहीं दूसरी तरफ कई यूज़र्स ने पूछा कि जब सबसे सुरक्षित इलाकों में भी ऐसी घटनाएँ हो सकती हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा का क्या होगा। यह सवाल सीधे–सीधे अमेरिकी सुरक्षा नीति और गन वायलेंस पर चल रही बहस को और तेज कर सकता है।
अफ़गान शरणार्थियों और सुरक्षा बहस पर असर
क्योंकि संदिग्ध की पृष्ठभूमि अफ़गान मूल और अमेरिकी एजेंसियों से पिछले संबंधों से जुड़ी बताई जा रही है, इस घटना के राजनीतिक और सामाजिक मायने और भी संवेदनशील हो गए हैं। कुछ रिपोर्ट्स में पहले से ही यह आशंका जताई जा रही है कि इस हमले के बहाने अफ़गान शरणार्थियों और वीज़ा प्रोग्राम्स पर और सख्ती की मांग उठ सकती है।
मानवाधिकार समूहों का कहना है कि लाखों शरणार्थियों को एक अकेले हमलावर की हरकत के आधार पर “संदेह की नज़र” से देखना खतरनाक होगा और इससे उन लोगों का जीवन और मुश्किल हो जाएगा, जो पहले ही युद्ध और हिंसा से भागकर किसी सुरक्षित जगह की तलाश में हैं। लेकिन दूसरी तरफ सुरक्षा विशेषज्ञों का तर्क है कि जब भी कोई ऐसा अटैक होता है तो रिस्क–एसेसमेंट और स्क्रीनिंग प्रोसेस को फिर से कसना सरकार की ज़िम्मेदारी बन जाती है।
क्या यह आतंकवाद है?
औपचारिक रूप से इसे फिलहाल “टारगेटेड शूटिंग” और “नेशनल गार्ड पर हमला” बताया जा रहा है, पर एफबीआई की जॉइंट टेररिज्म टास्क फोर्स की एंट्री ही इस बात का संकेत है कि जांचकर्ता इसे संभावित आतंकी एंगल से भी देख रहे हैं। अभी तक किसी बड़े आतंकी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, न ही सार्वजनिक रूप से हमलावर का कोई साफ़ राजनैतिक बयान सामने आया है, इसलिए एजेंसियां सोशल मीडिया पोस्ट, फोन रिकॉर्ड, पुराने कॉन्टैक्ट्स और यात्रा इतिहास की गहन जांच कर रही हैं।
तकनीकी रूप से किसी भी घटना को “टेरर अटैक” घोषित करने से पहले सरकार और एजेंसियों को यह देखना होता है कि क्या हमले का मकसद डर फैलाना, राजनीतिक–धार्मिक लक्ष्य साधना या किसी संगठन की विचारधारा आगे बढ़ाना था या नहीं। जब तक यह स्पष्ट नहीं होता, तब तक प्रशासन सावधानी से शब्द चुनकर अधिकतर इसे “टारगेटेड शूटिंग” कह रहा है, ताकि कानूनी और कूटनीतिक स्तर पर जल्दबाज़ी न हो।
आगे की राह: सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता
इस घटना के बाद वॉशिंगटन D.C. में सुरक्षा और निगरानी और कड़ी होने की पूरी संभावना है – जवानों की तैनाती बढ़ेगी, कैमरों और चेक–प्वाइंट्स की संख्या में इज़ाफ़ा होगा और व्हाइट हाउस के आसपास गश्त और सख्त हो सकती है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी यह पुराना सवाल उठेगा कि सुरक्षा बढ़ाने के नाम पर आम नागरिकों की निजता और नागरिक स्वतंत्रताओं पर कितना समझौता किया जाए।
दिलचस्प बात यह है कि नेशनल गार्ड को मूल रूप से राजधानी में अपराध कम करने और लोगों को “सेफ महसूस” कराने के लिए तैनात किया गया था, और अब वही जवान खुद हिंसा का निशाना बन गए हैं। यह विडंबना अमेरिकी समाज और शासन, दोनों के लिए एक कड़वा आईना है – जो यह दिखाती है कि बंदूकें सिर्फ़ “खतरे से बचाने” का ज़रिया नहीं, कई बार खुद सबसे बड़ा खतरा बन जाती हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का नतीजा क्या होगा – सख़्त गन लॉज़, और ज़्यादा मिलिटरी मौजूदगी, या शरणार्थी नीतियों में भारी बदलाव – यह आने वाले दिनों की राजनीति, जांच रिपोर्टों और अदालतों के फैसले तय करेंगे। फिलहाल इतना तय है कि व्हाइट हाउस के साए में हुई इस गोलीबारी ने अमेरिका को एक बार फिर याद दिला दिया है कि “सबसे सुरक्षित” जगह भी एक ट्रिगर दूर हैं।